- क्या जलवायु परिवर्तन से निपट सकती है चॉकलेट, क्या है काले रंग का पाउडर बायोचार
byBejod Ratna-
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हैम्बर्ग। जर्मनी के हैम्बर्ग की बायोचार इंडस्ट्री अभी अपने शुरुआती दौर में है, लेकिन इसमें अपार संभावनाएं हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह तकनीक धरती के वातावरण से कार्बन हटाने का अलग ही तरीका उपलब्ध कराती है। काले रंग का पाउडर बायोचार बनाने की खास विधि है। इस फैक्ट्री में कोको के बीज को खास विधि से जलाकर काला पाउडर बनाया जा रहा है। दावा है कि बायोचार नाम का ये खास काला पाउडर जलवायु परिवर्तन का सामना कर सकता है।
इसके लिए एक ऑक्सीजन मुक्त कमरे में कोको के छिलके को करीब 600 डिग्री सेल्सियस तक गर्म किया जाता है। यह प्रक्रिया ग्रीनहाउस गैसों को कैद कर लेती है।आखिर में जो चीज बनकर निकलती है, उसे खाद की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।इस चीज का इस्तेमाल ग्रीन कंक्रीट बनाने में सामग्री के तौर पर किया जा सकता है.पूरी दुनिया में करीब 4,000 करोड़ टन सालाना कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है।संयुक्त राष्ट्र के इंटर-गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज का कहना है कि बायोचार इसमें से करीब 260 करोड़ टन कार्बन डाइऑक्साइड को इकट्ठा करने में मदद कर सकता है।हालांकि, इसका पूरी दुनिया में इस्तेमाल बढ़ाना ही बड़ी चुनौती है।जर्मनी में बायोचार बनाने का काम सर्कुलर कार्बन नाम की कंपनी कर रही है।
सर्कुलर कार्बन का दावा है कि बायोचार मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर कर सकता है।ये काला पाउडर मिट्टी का कुदरती माइक्रो-बायोलॉजिकल संतुलन भी लौटा सकता है। कंपनी के सीईओ पाइक स्टेनलुंड के अनुसार हम कार्बन चक्र को उलट रहे हैं।सर्कुलर कार्बन की हैम्बर्ग की बायोचार फैक्ट्री यूरोप में अपनी तरह के सबसे बड़े संयंत्रों में है।यह संयंत्र पड़ोस की एक चॉकलेट फैक्ट्री से इस्तेमाल हो चुके कोको के खोल लेती है.चॉकलेट फैक्ट्री से सर्कुलर कार्बन के संयंत्र तक पाइपों का एक नेटवर्क बनाया गया है।बायोचार छिलके में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड को कैद कर लेता है।
यह प्रक्रिया किसी भी पौधे के साथ इस्तेमाल की जा सकती है।अगर कोको के छिलके सामान्य तौर पर फेंक दिए जाएं तो इसमें मौजूद कार्बन छिलके के गलने की प्रक्रिया के दौरान बाहर निकलकर वातावरण में मिल जाएगा।इसकी स्पंज जैसी संरचना मिट्टी की पानी और पोषण सोखने की क्षमता को बढ़ाती है।इससे पैदावार में इजाफा होता है। फ्रांस के यूनिलासाल्ला इंस्टिट्यूट में पर्यावरण वैज्ञानिक डेविड हूबन के मुताबिक, यह कार्बन बायोचार में सदियों तक कैद रह सकता है।एक टन बायोचार ढाई से तीन टन जितना कार्बन जमा कर सकता है।
अमेरिका में मूल निवासी समुदाय खाद के तौर पर बायोचार का इस्तेमाल करत आए हैं।फिर 20वीं सदी में अमेजन बेसिन की उपजाऊ मिट्टी पर शोध करते हुए वैज्ञानिकों ने इसे फिर से खोजा।हैम्बर्ग में इसे सफेद बोरियों में भरकर किसानों को बेचा जाता है.बायोचार बनाने की प्रक्रिया पायरोलिसिस कहलाती है।इसमें कुछ मात्रा में बायोगैस भी बनती है।इसे फैक्ट्रियों को ईंधन के लिए बेच दिया जाता है। वहीं, बायोचार के साथ उष्णकटिबंधीय वातावरण वाले क्षेत्र की मिट्टी ज्यादा कारगर होती है।हूबन ने बताया कि एक टन बायोचार के उत्पादन में एक हजार यूरो तक का खर्च आता है।
हैम्बर्ग संयंत्र में सालाना 10 हजार टन कोको के छिलके इस्तेमाल होते हैं।इससे 3,500 टन बायोचार और 20 मेगावॉट घंटे तक की बायोगैस बनाई जाती है।इसका उत्पादन काफी मुश्किल होता है।इसलिए ये अभी पूरी तरह से चलन में नहीं आ पा रहा है।बायोचार बनाने की प्रक्रिया में जितने कार्बन का उत्पादन होता है, उससे ज्यादा कार्बन जमा होना सुनिश्चित करने के लिए हर चीज स्थानीय स्तर पर करनी होती है।अगर चीजों का परिवहन होगा तो पर्यावरण को ज्यादा फायदा नहीं होगा।